चंद्र के साथ सूर्य,मंगल,शनि,बुध,शुक्र,गुरु, के युति का फल, hindi astroloy, Jyotish kirpa
|||चंद्रमा के साथ अन्य ग्रहो का प्रभाव और सम्बन्ध||| चंद्रमा सबसे ज्यादा जातक के मन को प्रभावित करता है क्योंकि चंद्र प्राणी का मन है जैसी स्थिति चंद्र की होगी वैसा ही मनोस्थिति जातक की होगी।अन्य ग्रहो के साथ चंद्र का सम्बन्ध होने पर जातक के मन पर उसी ग्रह के स्वभाव का प्रभाव आ जाता है जिस ग्रह के साथ चंद्र होता है।सूर्य से जितना अधिक दूर चंद्रमा होता है उतना ही शुभ और बली और जितना सूर्य के नजदीक यह होगा उतना ही कमजोर और निर्बल होता चला जाता है। (1).चंद्र के साथ सूर्य होने से यह निर्बल और अशुभ हो जाता है क्योंकि सूर्य अग्नि है तो चंद्र जल तो जब जल रूपी चंद्र अग्नि रूपी सूर्य के बहुत निकट आ जाता है तो सूर्य रूपी अग्नि चंद्र रूपी जल को जलाकर उसे निर्बल कर देती है। (2).चंद्र के साथ मंगल का सम्बन्ध नैसर्गिक रूप से शुभ फल देने वाला होता है।लग्न अनुसार और कुंडली की स्थिति के अनुसार चंद्र मंगल का शुभ सम्बन्ध शुभ परिणाम देने वाला होता है।कुंडली में चंद्र मंगल को युति लक्ष्मी योग बनाती है। (3).चंद्र बुध का सम्बन्ध सामान्य रूप से ठीक रहता है जातक को ललित कलाओ में रूचि होती है।चंद्र बुध का सम्बन्ध चोथे भाव में जातक की माँ को पेठ दर्द की दिक्कत दे सकता है। (4).चंद्र गुरु का सम्बन्ध अत्यंत शुभ और श्रेष्ठ फल देने वाला होता है।गुरु ज्ञान का प्रकाश है तो चंद्र मन है जब चंद्र रूपी मन पर ज्ञान रूपी गुरु का प्रभाव आ जाता है तो जीवन में रौशनी आती है।जिसके फल शुभ होते है। (5).चंद्र शुक्र का सम्बन्ध ठीक रहता है चंद्र मन है तो शुक्र प्रेम इनदोनो के आपसी सम्बन्ध होने से जातक का स्वभाव प्रेमी होता है प्रेम के लिए ऐसे जातक अत्यंत भावुक रहता है।चंद्र शुक्र के बली सम्बन्ध से प्रेम संबंधो में सफलता मिलती है।। (6).चंद्र शनि का सम्बन्ध किसी भी तरह से शुभ नही होता।चंद्र के साथ शनि का सम्बन्ध बन जाने से जातक मानसिक रूप से बेचैन और भयभीत रहता है।मन में ज्यादातर उदासी बनी रहती है।किसी गंभीर समस्या से ऐसे जातक बहुत अधिक बेचैन होकर अधिक परेशान भी हो जाते है।। (7).चंद्र के साथ राहु केतु का सम्बन्ध ग्रहण योग बनाता है जो मानसिक निर्बलता और बेचेनी देता है।यह सम्बन्ध कभी भी शुभ नही होता।कुंडली के जिस भाव में चंद्र के साथ राहु केतु का सम्बन्ध होता है उस भाव के फलो में कमी हो जाती है।इस योग में चंद्र का अधिक से अधिक बली होना स्थिति को सामान्य रखता है।
|||चंद्रमा के साथ अन्य ग्रहो का प्रभाव और सम्बन्ध||| चंद्रमा सबसे ज्यादा जातक के मन को प्रभावित करता है क्योंकि चंद्र प्राणी का मन है जैसी स्थिति चंद्र की होगी वैसा ही मनोस्थिति जातक की होगी।अन्य ग्रहो के साथ चंद्र का सम्बन्ध होने पर जातक के मन पर उसी ग्रह के स्वभाव का प्रभाव आ जाता है जिस ग्रह के साथ चंद्र होता है।सूर्य से जितना अधिक दूर चंद्रमा होता है उतना ही शुभ और बली और जितना सूर्य के नजदीक यह होगा उतना ही कमजोर और निर्बल होता चला जाता है। (1).चंद्र के साथ सूर्य होने से यह निर्बल और अशुभ हो जाता है क्योंकि सूर्य अग्नि है तो चंद्र जल तो जब जल रूपी चंद्र अग्नि रूपी सूर्य के बहुत निकट आ जाता है तो सूर्य रूपी अग्नि चंद्र रूपी जल को जलाकर उसे निर्बल कर देती है। (2).चंद्र के साथ मंगल का सम्बन्ध नैसर्गिक रूप से शुभ फल देने वाला होता है।लग्न अनुसार और कुंडली की स्थिति के अनुसार चंद्र मंगल का शुभ सम्बन्ध शुभ परिणाम देने वाला होता है।कुंडली में चंद्र मंगल को युति लक्ष्मी योग बनाती है। (3).चंद्र बुध का सम्बन्ध सामान्य रूप से ठीक रहता है जातक को ललित कलाओ में रूचि होती है।चंद्र बुध का सम्बन्ध चोथे भाव में जातक की माँ को पेठ दर्द की दिक्कत दे सकता है। (4).चंद्र गुरु का सम्बन्ध अत्यंत शुभ और श्रेष्ठ फल देने वाला होता है।गुरु ज्ञान का प्रकाश है तो चंद्र मन है जब चंद्र रूपी मन पर ज्ञान रूपी गुरु का प्रभाव आ जाता है तो जीवन में रौशनी आती है।जिसके फल शुभ होते है। (5).चंद्र शुक्र का सम्बन्ध ठीक रहता है चंद्र मन है तो शुक्र प्रेम इनदोनो के आपसी सम्बन्ध होने से जातक का स्वभाव प्रेमी होता है प्रेम के लिए ऐसे जातक अत्यंत भावुक रहता है।चंद्र शुक्र के बली सम्बन्ध से प्रेम संबंधो में सफलता मिलती है।। (6).चंद्र शनि का सम्बन्ध किसी भी तरह से शुभ नही होता।चंद्र के साथ शनि का सम्बन्ध बन जाने से जातक मानसिक रूप से बेचैन और भयभीत रहता है।मन में ज्यादातर उदासी बनी रहती है।किसी गंभीर समस्या से ऐसे जातक बहुत अधिक बेचैन होकर अधिक परेशान भी हो जाते है।। (7).चंद्र के साथ राहु केतु का सम्बन्ध ग्रहण योग बनाता है जो मानसिक निर्बलता और बेचेनी देता है।यह सम्बन्ध कभी भी शुभ नही होता।कुंडली के जिस भाव में चंद्र के साथ राहु केतु का सम्बन्ध होता है उस भाव के फलो में कमी हो जाती है।इस योग में चंद्र का अधिक से अधिक बली होना स्थिति को सामान्य रखता है।
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