उच्च संतान प्राप्ति के ज्योतिष के योग, Hindi astrology, Jyotish kirpa

योग्य एवं तेजस्वी संतान प्राप्ति के लिए उपयोगी ज्योतिषीय नियम !!
ASTROLOGICAL GUIDELINES FOR CONCEIVING A BRIGHT CHILD
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ुभ एवं उत्तम मुहूर्त में किया गया गर्भाधान यशस्वी संतान को जन्म देने वाला होता है 
उत्तम एवम् योग्य संतान कुल को पवित्र करने वाली होती है जिनके नाम पर परिवार की एक अलग पहचान होती है
सनातन धर्म और वेदो में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए।
पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज से मन सहित जीवात्मा का संयोग जिस समय होता है उसे गर्भाधान काल कहते हैं। संतान उत्पत्ति जीवन का अनिवार्य संस्कार है किंतु उसकी भावना कैसी है यह बहुत मायने रखती है
प्रबुद्ध वर्ग में ऐसी मान्यता है कि ज्योतिष के आधार पर उत्तम मुहूर्त का अनुगमन करे हुए यदि संतति प्राप्ति के दिशा में आगे बढ़ते है तो अभूतपूर्व परिणाम प्राप्ति होते दिखाई देते है और हम अपने अपूर्ण प्रयासों को भी संतति के माधयम से पूर्ण करने में समर्थ होते है
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर अंकुर शुभ मुहुर्त में हो तो उसका परिणाम भी उत्तम होता है। माता पिता को ध्यान देना चाहिए कि गर्भ धारण शुभ मुहुर्त में हो।
ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार गर्भ धारण के समय लग्न शुभ होकर बलवान होना चाहिए तथा केन्द्र (1, 4 ,7, 10) एवं त्रिकोण (5,9) में शुभ ग्रह 3, 6, 11 भावों में पाप ग्रह हो तो उत्तम रहता है। 
जब लग्न को सूर्य, मंगल और बृहस्पति देखता है और चन्द्रमा विषम नवमांश में होता है तो इसे काफी श्रेष्ठ स्थिति माना जाता है।
ज्योतिषशास्त्र कहता है कि गर्भधारण उन स्थितियों में नहीं करना चाहिए जब जन्म के समय चन्द्रमा जिस भाव में था उस भाव से चतुर्थ, अष्टम भाव में चन्द्रमा स्थित हो। गडांत, ग्रहण, सूर्योदय एवम सूर्यास्त्काल, निधन नक्षत्र, रिक्ता तिथि, दिवाकाल, भद्रा, पर्वकाल, अमावस्या, श्राद्ध के दिन, गंड तिथि, गंड नक्षत्र इसके अलावा तृतीय, पंचम या सप्तम तारा दोष बन रहा हो और भद्रा दोष लग रहा हो।
ज्योतिषशास्त्र के इन सिद्धान्तों का पालन किया जाये तो कुल की मर्यादा और गौरव को बढ़ाने वाली संतान का जन्म होने की सम्भावनाये बढ़ जाती है एवं उदंड अनुशासनहीनता, लडाई झगडे की प्रवॄति को काफी हद तक कम देखा जा सकता है
-गर्भाधान के समय व्यय भाव का स्वामी शुभ ग्रहों की संगति तथा प्रभाव में हो तथा चंद्रमा केन्द्र या त्रिकोण भाव में हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है। लग्न पर सूर्य का प्रभाव हो तो बच्चे माता दोनों सुरक्षित रहते हैं। गर्भाधान के समय रवि लग्न, तृतीय, पंचम या नवम भाव में हो तथा इनके स्वामी से एक भी संबंध हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है तथा भाग्यशाली दीर्घायु मानव जन्म होता है।
कुशल ज्योतिषियों के द्वारा कुंडली के ग्रहो की परिस्थिति का आकलन करके अच्छे मुहूर्त और ग्रह दशा के द्वारा गर्भधान का उत्तम समय जाना जा सकता है



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