शनि ग्रह से विचार और प्रभाव


शनि ग्रह

नमस्कार दोस्तों, ग्रहों को जानो  एक और ग्रह शनि ग्रह
आज हम बात करेंगे एक अति महत्वपूर्ण ग्रह के बारे में, जिसका कुंडली में एक विशेष और अहम रोल होता है, जिसका नाम सुनते ही अच्छे-2 पहलवान भी हिल जाते हैं और खौफ खाने लगते हैं- जी हाँ सही सोचा आपने उसे हम शनि देव के नाम से जानते हैं।
दोस्तों शनि देव का नाम सुनते ही हम खौफ खाने लगते हैं, लेकिन अगर सही मायने मे कहूँ तो शनि हमारे दुश्मन नहीं दोस्त हैं, शनि ग्रह से डरने की ज़रूरत नहीं-
शनि को नवग्रहों में न्यायधीश की उपाधि प्राप्त है, ये हमारे द्वारा किये गए पापों और गलतियों की सजा हमें देते हैं साढेसाती, ढ़इया और महादशा के रूप में। यह सूर्यदेव और छाया के पुत्र कहलाते हैं, लेकिन पिता से इनकी तनिक भी नहीं बनती दोनों परम शत्रु माने जाते हैं। यह जिसपर भी अपनी कुदृष्टि डाल देते हैं उसको तो फिर भगवान भी न बचा पाये, लेकिन इनकी टेढ़ी दृष्टि भी उन्ही पर पड़ती है जो अन्याय करते हैं, जो पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं, जो गरीब और मजदूरों पर जुल्म ढाते हैं, इसी की सजा शनि अपनी साढे साती में देते हैं। कहते हैं जब भगवान रामचंद्र जी को बनवास हुआ तब उनकी साढे साती शुरू हुई थी, फिर हम तो इंसान हैं।
लेकिन शनि सबको भी प्रताड़ित नहीं करते, अगर मनुष्य न्याय की राह पर चले, शुभ कर्म करता रहे तो इस दौरान रंक से राजा भी बना देता है, भले ही यह अशुभ और पापी ग्रह की श्रेणी में आता है लेकिन कर्मो के अनुशार ही ये हमें अच्छे और बुरे फल प्रदान करता है, इशलिये इनसे डरने की ज़रूरत नहीं।
अभी धनु, तुला,और वृश्चिक राशि साढ़े साती के प्रभाव में हैं, 26 अक्टूबर-17 को शनि वृश्चिक राशि से वापस धनु राशि में आ जायेगा, तुला राशि पर से साढ़े साती का प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो जायेगा इसी के साथ ही मकर राशि पर इसका प्रभाव शुरू हो जायेगा। वृषभ और मेष राशि पर अभी ढय्या चल रही है।

दोस्तों शनि को दो राशियाँ मकर और कुम्भ का स्वामित्व प्राप्त है और इनके तीन नक्षत्र होते हैं जो क्रमशः पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद हैं।
यह तुला राशि में उच्च और मेष में नीच के हो जाते हैं, मकर और कुम्भ में स्वराशि के होते हैं। शनि ठंडा और नपुंशक ग्रह की श्रेणी में आता है। इनके मित्र बुध और शुक्र हैं, शत्रु सूर्य, चंद्र और मंगल जबकि गुरु इनके सम होते हैं।
इनकी तीन दृष्टियां-3,7 व 10 होती हैं।अष्टम भाव इनका घर माना जाता है और इस भाव में इन्हें शुभ माना जाता है।
अष्टम अगर शनि हो तो दीर्घायु प्राप्ति होती है।
इसे मंद और धीमा ग्रह माना जाता है, इसके दूषित होने पर अच्छे से अच्छे काम में गतिहीनता आ जाती है।
शनि कारक होते हैं- आयु,जीवन,मृत्यु,दुर्भाग्य,संकट,अनादर,बीमारी,गरीबी,आजीविका,अनेतिक कार्य,कृषि से सम्बंधित रोज़गार, सेवक, नौकर, नौकरियां,चोरी, क्रूर कार्य, बुजुर्ग,पंगुता, लोभ, लालच, मज़दूर, भिखारी आदि।
रिश्तों में चाचा, दादा, ताऊ का प्रतिक है।
कुंडली में शनि अगर ख़राब हो तो अशुभ फल अधिक देता है अपनी दशा और अन्तर्दशा में, इसके अशुभ होने से इंसान का जीना दूभर हो जाता है क्योंकि यह अधिकतर लंबी चलने वाली बीमारियां अधिक देता है या लाइलाज और जानलेवा बीमारिया दे देता है, जिसमे मुख्यतः कैंसर, लकवा होता है। शनि से मुख्यतः- स्नायु तंत्र से जुड़े रोग, जोड़ों का दर्द, कमर व पीठ दर्द, नपुनशक्ता, पेटदर्द, वायुरोग, पेट की समस्या, मांसपेशियों की प्रॉब्लम, दमा, अपच, कब्ज़, बालों का झड़ना आदि।
इसके अतिरिक्त यह नौकरी में परेशानी, बेरोज़गारी, दरिद्रता, व्यसनों में लिप्त होना, दांपत्य जीवन में परेशानी भी दे देता है।
अगर शनि कुंडली में तुला, मकर और कुम्भ राशि में केंद्रगत हो तो सश नामक पंचमहा पुरुष नामक योग भी बनाता है जो की शुभ होता है। और साढ़े साती, दशा, अंतर में शुभ फल ही देता है, वहीँ अशुभ होने जैसे नीच, शत्रु राशि, 6, 8, 12 भाव में होने पर या सूर्य से युति होने पर अशुभ फलों में वृद्धि करता है, लेकिन अष्टमेश में इसे आयुकारक माना जाता है, क्योंकि शनि मंद है और अष्टम भाव से आयु को देखते हैं।
दोस्तों अगर कुंडली में इसकी युति सूर्य संग दशम भाव में हो तो पिता पुत्र सम्बन्ध अच्छे नहीं रहते पिता अधिकतर बीमार रहते हैं, वहीँ सप्तम में होने पर पति-पत्नी में वैचारिक मतभेद उत्पन्न करता है व वैवाहिक जीवन शुखमय नहीं रहता।
यह जहाँ बुलंदियों पर पहुंचा देता है वहीँ अगर रुष्ट हो जाये तो जमीन पर भी पटक देता है।
इसलिए बोलते भी हैं शनि महा दशा बहुत बड़ा बदलाव लाती है, अधिकतर इंसान शनि की दशा में शुधर जाते हैं।
शनि ग्रह से विचार और प्रभाव शनि ग्रह से विचार और प्रभाव Reviewed by Jyotish kirpa on 02:04 Rating: 5

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